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मध्य प्रदेश में चोरी हुआ गांव: सरकारी अनाज को तरसे गांववाले, अफसरों की ये ग़लती पड़ रही भारी

MP Crime: मध्य प्रदेश की ज़मीन पर एक गांव (Village) है। वहां इंसान (Human) भी रहते हैं और वो भी सब के सब ज़िंदा (Live)। इन ज़िंदा इंसानों की गिनती क़रीब साढ़े चार सौ के करीब है। इस गांव का बाकायदा एक नाम भी है उदयपुरा। जो गुना ज़िले में आता है। लेकिन मध्य प्रदेश के सरकारी कागज़ों (Govt Document) पर ये गांव ग़ायब है। ये बात सुनने में जितनी अटपटी लग रही है, उससे भी कहीं ज्यादा हैरतअंगेज है।

असल में गुना ज़िले के मधुसूदनगढ़ के इलाक़े में मौजूद गांव उदयपुरा किसी ज़माने में पंचायत का हिस्सा हुआ करता था। लेकिन जब सरकार की तरफ से परिसीमन किया गया तो पंचायत को नगर परिषद में शामिल कर लिया गया और उदयपुरा गांव को दूसरी पंचायत के साथ जोड़ दिया गया।

ये खानापूर्ति तो हो गई लेकिन उस गांव की पैमाइश नहीं हुई और अधूरी कागजी कार्रवाई की वजह से उस गांव से जुड़े सारे काम जहां के तहां थम गए। और विकास का पहिया रुक गया। अब गांव के लोग सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटते काटते थक गए। लिहाजा कहा जाने लगा कि शायद गांव पूरा चोरी हो गया।

मध्य प्रदेश के गुना ज़िले का नक्शा

MP Crime Story: दरअसल गुना ज़िले में मुख्यालय से क़रीब 90 किलोमीटर दूर मौजूद है उदयपुरा गांव। इस गांव में क़रीब 300 से ज़्यादा वोटर भी हुआ करते थे। उदयपुरा गांव मधुसूदनगढ़ तहसील के तहत राघोगढ़ जनपद में आता है। और इस गांव की पंचायत का नाम तोरई था।

लेकिन नई परिसीमन में जब सरकारी कागज़ों पर मधुसूदनगढ़ को नगर परिषद बनाया गया तो उसमें चार पंचायतों को शामिल कर लिया गया। मगर पांचवां गांव उदयपुरा इस रेस में पीछे छूट गया और उसे नगर परिषद में नहीं जोड़ा गया। लेकिन सरकारी बाबुओं ने गांव पर तरस खाते हुए उसे करेला पंचायत के साथ जोड़ दिया...मगर सरकारी अफसर उस गांव को पैमाइश और मैपिंग करना ही भूल गए।

इस बात का पता तब चला जब इस गांव को ऑनलाइन देखा गया। असल में उदयपुरा गांव पुरानी पंचायत यानी तोरई में तो दिखाई दे रहा है, मगर करेला पंचायत को ऑनलाइन देखते हैं तो उदयपुरा गांव नदारद नज़र आता है। जाहिर है जब गांव दिखेगा ही नहीं तो उसका कोई काम भी नहीं होगा। बस यही बात इस गांव के लिए अभिशाप बन गई है। और इस श्राप की वजह से गांव आने से पहले ही विकास की गाड़ी रुक जाती है।

Ajab Gaon Ki ghazab kahani: गांव वालों के लिए परेशानी उस वक़्त बहुत बढ़ जाती है जब उनके बच्चों का स्कूल में दाखिला तक नहीं हो पाता। क्योंकि जब दाखिले के वक्त आईडी की बात आती है तो गांव का अता पता ही नहीं चलता और बात अटक जाती है।

बीते बरस इस गांव के किसी भी बच्चे का स्कूल में दाखिला नहीं हो सका। इसके अलावा इस गांव में रहने वालों को सरकारी राशन भी नहीं मिल पा रहा है क्योंकि पोर्टल पर जब गांव दिखेगा तब तो राशन मिलेगा। पिछले एक साल से ये गांव इन दुश्वारियों से गुज़र रहा है।

गांव के लोगों की बातों पर यकीन किया जाए तो उदयपुरा शासन और प्रशासन के दस्तावेजों में है ही नहीं। ऐसे में कोई निजाम काम करे भी तो कैसे। इन सारी बातों से जूझते जूझते गांव वालों को एक साल हो गया है। तभी तो गांव के लोग कहने लगे हैं कि उनका गांव चोरी हो गया।

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