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18 मई से अगले 18 दिन तक 'श्रद्धा'को टुकड़ा टुकड़ा दिल्ली भर में बिखेरता रहा आफ़ताब

Shraddha Murder Case: 18 मई 2022 D-93/1 छतरपुर, दिल्ली
वो 18 मई की रात थी...जब आफताब और श्रद्धा (Shraddha) का झगड़ा हुआ...झगड़े की वजह वही पुरानी थी...श्रद्धा शादी (Marriage) करना चाहती थी और आफताब हमेशा की तरह टाल रहा था।
मगर इस रात (Night) झगड़ा इतना बढ़ गया कि गुस्से में आफताब ने श्रद्धा का गला जोर से पकड़ लिया...और तब तक पकड़े रहा जब तक कि वो मर नहीं गई।

क़त्ल के बाद अब उसने ठंडे दिमाग से लाश को ठिकाने लगाने की साज़िश रचनी शुरू की...पहली रात उसने लाश के साथ उसी घर में गुजारी। अगले रोज यानी 19 मई को दिन में वो लोकल मार्केट की तिलक इलेक्ट्रॉनिक शॉप से एक बड़ा वाला फ्रिज खरीदकर लाता है।
साथ ही एक बड़ी आरी....घर आने के बाद अब वो बाथरूम में बैठकर लाश के छोटे छोटे टुकड़े करना शुरू करता है।

मई के महीने में फ्रिज में रखी अधूरी लाश

Shraddha Murder Case: छोटे छोटे पॉलिथिन वो पहले ही ला चुका था। पर चूंकि मई का महीना था... गर्मी तेज़ ...लाश लगभग 24 घंटे पुरानी होने वाली थी लिहाजा बदबू आनी शुरू हो गई थी। अब वो लाश के टुकड़े करता...बाथरूम साफ करता...और बीच बीच बीच में पूरे घर में परफ्यूम डालता जाता...
लाश के टुकड़ों को वो बारी बारी से फ्रिज में रख रहा था...उसी फ्रिज में जिसमें उसने पहले से ही पीने का पानी और दूध भी रखा हुआ था। पूरे लाश के टुकड़े एक दिन में हो नहीं सकते थे...इसलिए उसने आधी अधूरी लाश फ्रिज में डाल दी...बाकी टुकड़ों के साथ...फिर रात को जुमेटो से खाना मंगवाया...खाना खाने के बाद आराम किया...फिर रात ठीक दो बजे...लाशों के टुकड़ों की पहली किस्त पॉलिथिन में डालकर घर से बाहर निकलता है...पैदल ही महरौली के जंगल की तरफ जाता है...टुकड़े फेंकता है...वापस घर लौट आता है...
फिर उसी कमरे में बड़े इत्मिनान से सो जाता है...जिस कमरे में फ्रिज और फ्रिज में लाश रखी थी।

आफताब का वो आधी रात के बाद का सफर!

Shraddha Murder Case: 19 मई को शुरू हुआ ये सिलसिला अगले 18 दिनों यानी 5 जून तक लगातार इसी तरह चलता रहा...इन 18 दिनों में हर रात आफताब ठीक दो बजे पॉलिथिन में पैक श्रद्धा की लाश के टुकड़ों को लेकर घर से निकलता और कहीं सूनसान जगह पर फेंक कर चला आता।

एक तफ्तीश के मुताबिक छतरपुर में आफताब के घर से महरौली के जंगल तक का रास्ता क़रीब चार किलोमीटर पड़ता है। और इतनी दूरी तय करने में आमतौर पर एक इंसान को सामान्य पैदल चाल में एक घंटा तक का समय लगता है। जबकि छतरपुर से कुतुब इंस्टीट्यूशनल एरिया में मौजूद संजय वन की दूरी करीब छह किलोमीटर की है और इस दूरी को तय करने में करीब डेढ़ से पौने दो घंटे का वक़्त लग जाता है।

इससे भी ज्यादा हैरान करने वाली बात ये है कि इतनी दूरी तय करने के दौरान किसी भी शख्स को कम से कम कई पुलिस थाने और कई पुलिस चौकियों के दायरे से होकर गुज़रना पड़ता है। गौर करने वाला पहलू ये है कि आफताब लाश के टुकड़े पिट्ठू बैग में भरकर ले जाता था। और वो भी रात के दो बजे के बाद। यानी ये ऐसा समय है जब आमतौर पर कॉल सेंटर में काम करने वाले निकलते हैं। मुमकिन है कि इस दौरान पुलिस से भी आफताब का सामना हुआ हो और उसने पुलिस को कोई न कोई पट्टी ज़रूर पढ़ाई हो...।

उसने टुकड़े कभी भी एक ही इलाके में एक ही जगह पर नहीं फेंके...बल्कि हमेशा अलग अलग इलाका चुना और अलग अलग जगह... ताकि लाश के टुकड़े कहीं मिल भी जाएं तो लाश की असलियत न मिल पाए...इन पूरे 18 दिनों में आफताब कभी किसी पड़ोसी से नहीं मिलता और न ही उनसे बात करता...

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