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What is UAPA? क्या है UAPA? कैसे ये कानून आतंकी गतिविधियों में दिलाता है सजा, जानिए

Terrorist Yasin Malik: कश्मीरी अलगाववादी नेता यासीन मलिक की सजा पर दोपहर साढ़े तीन बजे फैसला आने जा रहा है. जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के प्रमुख मलिक ने टेरर फंडिंग केस (Terror Funding Case) के एक मामले में सभी आरोप स्वीकार कर लिए थे, जिनमें गैरकाकूनी गतिविधि रोकथाम कानून के तहत आरोप भी शामिल हैं.

क्‍या होता है UAPA कानून? | What is UAPA Act?

UAPA यानी का फुल फॉर्म Unlawful Activities (Prevention) Act यानी गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम. इस कानून का मुख्य उद्देश्य आतंकी गतिविधियों को रोकना होता है. सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिसनर अधिवक्ता अश्विनी दुबे ने बताया कि इसके तहत पुलिस ऐसे आतंकियों, अपराधियों या संदिग्ध लोगों को चिह्नित करती है, जो आतंकी ग​तिविधियों में शामिल होते हैं, आतंकी गतिविधि के लिए लोगों को तैयार करते हैं या फिर ऐसी गतिविधियों को बढ़ावा देते हैं. ऐसे मामलों में एनआईए यानी राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) के पास काफी शक्तियां होती है. एनआईए महानिदेशक के पास तो यह अधिकार भी होता है कि जांच के दौरान वह संदिग्ध या आरोपी की संपत्ति भी कुर्की-जब्ती करवा सकते हैं.

1967 में आया UAPA कानून

UAPA कानून वर्ष 1967 में लाया गया था. तब इसे संविधान के अनुच्छेद 19(1) के तहत दी गई बुनियादी आजादी पर तर्कसंगत सीमाएं लगाने के लिए लाया गया था. पिछले कुछ सालों में आतंकी गतिविधि संबंधी POTA और TADA जैसे कानून तो खत्म कर दिए गए, लेकिन UAPA कानून मौजूद है और यह पहले से ज्यादा मजबूत हुआ है.

2019 में संशोधन के बाद बढ़ी शक्ति

यूएपीए बिल के तहत केंद्र सरकार किसी भी संगठन को आतंकी संगठन घोषित कर सकती है अगर निम्न 4 में से किसी एक में उसे शामिल पाया जाता है.

  • आतंक से जुड़े किसी भी मामले में उसकी सहभागिता या किसी तरह का कोई कमिटमेंट पाया जाता है.

  • आतंकवाद की तैयारी

  • आतंकवाद को बढ़ावा देना

  • आतंकी गतिविधियों में किसी अन्य तरह की संलिप्तता

इस एक्ट के प्रावधानों को समझें :

  • कानून पूरे देश में लागू होता है.

  • इस कानून के तहत केस में एंटीसिपेटरी बेल यानी अग्रिम ज़मानत नहीं मिल सकती.

  • किसी भी भारतीय या विदेशी के खिलाफ इस कानून के तहत केस चल सकता है. अपराध की लोकेशन या प्रवृत्ति से कोई फर्क नहीं पड़ता.

  • विदेशी धरती पर अपराध किए जाने के मामले में भी इसके तहत मुकदमा दर्ज हो सकता है.

  • भारत में रजिस्टर जहाज़ या विमान में हुए अपराध के मामलों में भी यह कानून लागू हो सकता है.

  • मुख्य तौर पर यह कानून आतंकवाद और नक्सलवाद से निपटने के लिए है.

  • किसी भी तरह की व्यक्तिगत या सामूहिक गैरकानूनी गतिविधि, जिससे देश की सुरक्षा, एकता और अखंडता को खतरा हो, इस कानून के दायरे में है.

  • यह कानून राष्ट्रीय इनवेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) को अधिकार देता है कि वो किसी तरह की आतंकी गतिविधि में शामिल संदिग्ध को आतंकी घोषित कर सके.

  • इस कानून से पहले समूहों को ही आतंकवादी घोषित किया जा सकता था, लेकिन 2019 में इस संशोधित कानून के बाद किसी व्यक्ति को भी संदिग्ध आतंकी या आतंकवादी घोषित किया जा सकता है.

संदेह के आधार पर घोषित किए जा सकते हैं आ​तंकी

इस कानून के तहत किसी व्यक्ति पर संदेह होने मात्र से ही पुलिस या जांच एजेंसी उसे आतंकवादी घोषित कर सकती है. इसके लिए यह भी मायने नहीं रखता कि उस संदिग्ध व्यक्ति का किसी आतंकी संगठन से संबंध है या नहीं. आतंकवादी का टैग हटवाने के​ लिए उसे सरकार द्वारा बनाई गई रिव्यू कमेटी के पास जाना होगा. हालांकि बाद में कोर्ट में भी अपील की जा सकती है.

UAPA की कई धाराओं में कठोर प्रावधान

यूएपीए में धारा 18, 16, 19, 20, 38 और 39 के तहत केस दर्ज होता है. आरोपी के आतंकी संगठन से जुड़े होने की बात सामने आने पर धारा 38 लगती है. वहीं, आतंकी संगठनों को मदद पहुंचाने पर धारा 39 लगाई जाती है. इस एक्ट के सेक्शन 43D (2) में किसी शख्स की पुलिस कस्टडी की अवधि दोगुना करने का प्रावधान है. इसके तहत पुलिस को 30 दिन तक की कस्टडी मिल सकती है. अन्य कानूनों की अपेक्षा इसमें न्यायिक हिरासत 30 दिन ज्यादा यानी 90 दिन की भी हो सकती है.

The Unlawful Activities Prevention Act-1967 की धारा-16 में आतंकवादी गतिविधियों का जिक्र किया गया है. इसमें आतंकी गतिविधियों को लेकर सजा की बात कही गई है.

UAPA की धारा-16a में कहा गया है कि अगर आतंकी गतिविधि के दौरान किसी भी वजह से कोई मौत हो जाती है तो उसमें अधिकतम फांसी की सजा होगी. या फिर आजीवन कारावास की सजा होगी. इसके साथ ही जुर्माना भी लगाया जा सकता है.

किस तरह NIA की ताकत बढ़ाता है कानून?

पहले यह व्यवस्था थी कि आतंकवाद के किसी भी मामले में संपत्ति सीज करने की कार्यवाही जांच अधिकारी बगैर डीजीपी की अनुमति के कर नहीं सकता था, लेकिन इस कानून में प्रावधान है कि एनआईए का जांच अफसर सिर्फ एनआईए के डीजी की इजाज़त से यह कार्रवाई कर सकता है. यानी यह कानून एनआईए को असीमित अधिकार दे देता है.

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