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What is self-defence ? आत्मरक्षा कानून क्या है ?

Self Defence : कानून में हरेक को ये अधिकार प्राप्त है कि वो खुद की रक्षा करे, लेकिन अगर खुद की रक्षा करते हुए दूसरे की मौत हो जाए तो फिर क्या आरोपी के खिलाफ मुकदमा दर्ज होगा तो इसका जवाब जान लेते है।

What is self-defence ?

आत्मरक्षा कानून क्या है ?

आत्मरक्षा मतलब खुद की रक्षा करना। कानून में हरेक को ये अधिकार प्राप्त है कि वो खुद की रक्षा करे, लेकिन अगर खुद की रक्षा करते हुए दूसरे की मौत हो जाए तो फिर क्या आरोपी के खिलाफ मुकदमा दर्ज होगा और उसे आरोपी बनाया जाएगा। तो इसका जवान जान लेते हैं। यहां दो परिस्थितियों को समझना जरूरी है। पहला, कोई भी व्यक्ति किसी भी हमले के खिलाफ खुद की रक्षा करता है तो इसे आत्मरक्षा कहा जाएगा, लेकिन इस मामले की परिस्थितियां और तथ्य ये इशारा कर रही हो कि व्यक्ति ने वास्तव में खुद की रक्षा के लिए अपराध को अंजाम दिया है और दूसरा व्यक्ति उसके खिलाफ बल प्रयोग,हथियार प्रयोग व अन्य प्रयोग कर रहा था। दूसरा, अगर किसी के घर में चोर घुस आए हो, ऐसे में व्यक्ति स्वयं की संपत्ति की रक्षा के लिए आत्मरक्षा के अधिकार का इस्तेमाल कर सकता है और दूसरे के खिलाफ बल प्रयोग कर सकता है, लेकिन इसकी भी एक सीमा है।

आत्मरक्षा के अधिकार के सिद्धांत

इसका बेसिक सिद्धांत यही है कि खुद की रक्षा करो, लेकिन कानून के दायरे में रह कर।

आत्मरक्षा की सीमाएं

आत्मरक्षा की भी सीमाएं होती है। आत्मरक्षा का मतलब ये बिल्कुल भी नहीं है कि आप किसी की जान ले सकते है और आपको सजा नहीं होगी। आप उतनी चोट पहुंचा सकते हो, जितनी जरूरी है।

आत्मरक्षा को साबित करने की जिम्मेदारी अभियुक्त की होती है

कानून के मुताबिक, ये जिम्मेदारी अभियुक्त की होती है कि वह तथ्यों व परिस्थितियों के द्वारा ये साबित करे कि उसका काम आत्मरक्षा में किया गया है। कई बार आरोपी पीड़ित को चोट पहुंचा देता है, ऐसे में आत्मरक्षा के अधिकार का इस्तेमाल करते हुए पीड़ित भी आरोपी को एक सीमा तक चोट पहुंचा सकता है। ऐसे में पीड़ित को अदालत के समक्ष ये सिद्ध करना होता है कि उसने जो फलां अपराध किया था, उसके पीछे दरअसल उसकी मंशा अपराधी को रोकने की थी और अगर वो अपराधी को नहीं रोकता तो वो उसको हानि पहुंचा सकता था।

अगर आपने हत्या कर दी, लेकिन इसके पीछे परिस्थिति कुछ और थी ? तो क्या आप बच सकते है ?

ये सवाल लाजिमी है कि अगर आत्मरक्षा करते हुए किसी दूसरे का अहित हो जाए। मसलन, उसके चोट लग जाए, उसकी मौत हो जाए तो क्या ऐसी परिस्थितियों में उसके खिलाफ मामला दर्ज होगा। आत्मरक्षा के लिए आरोपी के खिलाफ खड़ा व्यक्ति न्याय संगत होना चाहिए। आईपीसी की धारा 103 (Section 103 of IPC) के मुताबिक, लूट, रात्रि में घर में सेंध, आगजनी, चोरी आदि की स्थिति में अगर जान का खतरा हो तो आक्रमणकारी की हत्या करना न्याय संगत होगा। हालांकि ऐसे में मुकदमा तो दर्ज होगा, लेकिन सजा में रियायत मिल सकती है।

किस कानून के तहत इसे पारिभाषित किया गया है ?

दरअसल, भारतीय दण्ड संहिता की धारा 96 से लेकर 106 (Sections 96 to 106 of Indian Penal Code) तक की धारा में सभी व्यक्तियों को आत्मरक्षा का अधिकार दिया गया है।

सेक्शन 100 आईपीसी क्या कहता है ?

भारतीय दंड संहिता की धारा 100 के अनुसार, भारत में रह रहे हर एक नागरिक का भारत पर समान भागीदारी होती है और इसके तहत भारत के हर एक व्यक्ति की जिम्मेदारी भारत सरकार या राज्य सरकार की होता है। मगर सरकार हर एक व्यक्ति को सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकती है। इसलिए IPC Section 100 के अनुसार, हर एक नागरिक को खुद की रक्षा करने का प्रावधान दिया गया है।

भारतीय दंड संहिता कि धारा 100 के अनुसार, खुद को किसी भी हमले से बचाने के लिए हमलावर पर वार करना कोई अपराध नहीं माना जाता बल्कि यह एक अधिकार है। उसे खुद की रक्षा करने के दायरे से खुद पर लगे आरोप से बरी कर दिया जाता है।

आत्मरक्षा किन परिस्थितियों में मानी जाएगी

1. अपने ऊपर हो रहे हमले को रोकने के लिए

2. रेप की परिस्थिति में

3. चोरी या डकैती की स्थिति में

इन परिस्थितियों में आप Self Defence का इस्तेमाल कर सकते है, लेकिन एक सीमा के दायरे में रह कर।

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