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Remission policy: क्या कैदी सजा पूरी करने से पहले जेल से बाहर आ सकता है ? क्या है रेमिशन पॉलिसी ?

What is Remission policy ?

क्या है रेमिशन पॉलिसी ?

किसी अपराध की अगर सजा 10 साल है, तो क्या उससे पहले आरोपी जेल से बाहर आ सकता है ? इसका जवाब है हां। अब सवाल ये है कि ये कैसे संभव है ? दरअसल, जेल राज्यों का SUBJECT है। यानी जेल के बारे में सारे अधिकार राज्य या कहें कि केंद्र शासित प्रदेशों को प्रदान किए गए है। वो JAIL MANUAL को लागू करने के लिए प्रतिबद्ध है। अदालत जब किसी कैदी को सजा सुनाती है तो साथ साथ ये अधिकार राज्य सरकार को दिया जाता है कि वो कैदी अपराध की पूरी सजा काटे या फिर कई बार राज्य सरकार विशेषाधिकार का इस्तेमाल करते हुए सजा में कटौती कर सकती है। यानी बाकी बची सजा को कम या पूरी तरह माफ भी कर सकती है।

छूट नीति (What is Remission policy) कैदी की सजा को लेकर बनाई गई है। इसमें कई बार कैदी को संबंधित अपराध की पूरी सजा से पहले रिहा कर दिया जाता है। इसे ही छूट नीति कहां गया है।

What is Remission policy? इसके तहत समय से पहले रिहाई के लिए कैदी आवेदन कर सकते हैं। 20 साल से ज्यादा, उम्र कैद वाले या सजायाफ्ता कैदी अपनी एक तिहाई सजा काट चुका है तो वह समय पहले रिहाई के लिए आवेदन कर सकता है। उसके आवेदन पर सरकार विचार करती है। आचरण और जांच रिपोर्ट के बाद उसे रिहा किया जा सकता है।

क्या एक निर्धारित सजा काटने के बाद ही छूट मिल सकती है ?

ज्यादातर मामलों में देखा गया है कि किसी अपराध की कम से कम सजा काटने के बाद बाकी बची सजा से छूट मिल जाती है।

क्या हर राज्य की कैदियों को लेकर अलग अलग छूट नीति है ?

राज्य सरकारें कैदियों की सजा को लेकर फैसला ले सकती है। हर राज्य सरकार के अपने अपने कानून होते है। पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राज्य सरकार के पास CRPC (आपराधिक प्रक्रिया संहिता) के तहत ये अधिकार है कि वो कैदियों की सजा को माफ करे या छूट दे। लेकिन ये एक निर्धारित अवधि तक सजा काटने के बाद ही संभव है। हत्या जैसे संगीन मामलों में कम से कम 14 साल की सजा काटने के बाद राज्य सरकार इस पर फैसला ले सकती है।

किस तरह के अपराधों के लिए मिल सकती है छूट ? या कितनी सजा वाले अपराधों के लिए मिल सकती है छूट

What is Remission policy? चोरी, झपटमारी जैसे छोटे मामलों की अपेक्षा संगीन मामलों में परिस्थितियां अलग होती है। रेप के मामलों में कई बार सजा में रियायत नहीं दी जाती है, लेकिन कई बार दे भी दी जाती है। कई बार छोटी सजा वाले अपराधों के कैदियों को भी छूट मिल जाती है।

किन मौके पर दी जाती है कैदियों की सजा में छूट ?

कैदियों को 15 अगस्त, 26 जनवरी, 2 अक्टूबर जैसी विशेष तिथियों पर सजा में छूट देने का प्रावधान है। राज्य सरकार इन तिथियों को जमानत, पेरौल आदि प्रदान करती है। विशेषकर गणतंत्र दिवस पर कारागार से पैरोल और फरलो पर गए अपराधियों को छूट दी जाती है।

10 मौके जिन पर रिहा होते है बंदी

गणतंत्र दिवस (26 जनवरी)

महिला दिवस (8 मार्च)

विश्व स्वास्थ्य दिवस (7 अप्रैल)

मजदूर दिवस (1 मई)

विश्व योग दिवस (21 जून)

स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त)

गांधी जयंती (2 अक्टूबर)

शिक्षक दिवस (5 सितंबर)

अंतर्राष्ट्रीय सहिष्णुता दिवस (16 नवंबर)

अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस (10 दिसंबर)

सजा में कितनी छूट मिल सकती है ?

ये हरेक केस के तथ्यों एवं परिस्थितयों के आधार पर तय होता है। दरअसल, राज्य सरकार का गृह मंत्रालय यह तय करता है कि किस मामले में छूट दी जा सकती है और किस मामले में नहीं ? इसमें संबंधित मंत्री, अफसर और जेल अधिकारी मिलकर ये तय करते है कि फलां कैदी की सजा माफ की जाए या नहीं ?, कितनी माफ की जाए ? और साथ में क्या क्या कंडिशन लगाई जाए ? कई बार हत्या जैसे संगीन मामलों में भी सजा में छूट दी जाती है, कई बार नहीं।

क्या जेल में कैदियों का बर्ताव भी बनता है आधार ?

जेल में कैदियों के बर्ताव के आधार पर भी ये तय होता है कि कैदी की बाकी सजा को माफ किया जाए या नहीं। कई बार कैदी का आचरण अच्छा होता है तो उसे इसका फायदा मिलता है। मसलन, कई बार कैदी जेल में दूसरे कैदियों को पढ़ाते हैं, दूसरे सकारात्मक कार्य करते हैं तो इसे GOOD CONDUCT में गिना जाता है और इसका फायदा कैदी को मिलता है। अगर कैदी की शिकायतें मिले तो उसे सजा में छूट का फायदा नहीं मिलता है।

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किस कानून के तहत मिलती है छूट ?

सरकार संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत विशेष छूट दे सकती है। राज्य सरकारें एक निश्चित मापदंड के आधार पर किसी व्यक्ति की सजा कम करने की शक्ति रखती है। IPC (भारतीय दंड संहिता) की धारा 55 और 57 में सरकारों को सजा को कम करने का अधिकार दिया गया है। इसके साथ साथ

CRPC (दंड प्रक्रिया संहिता) 1973 की धारा 433 के तहत सरकार को इन चार तरह की सजा को कम करने का अधिकार है।

1. सजा-ए-मौत को किसी अन्य सजा के रूप में कम कर सकती है।

2. आजीवन कारावास को 14 साल के बाद जुर्माने के रूप में कम कर सकती है।

3. कठिन कारावास की सजा को एक समय के बाद जुर्माने या जेल के रूप में कम कर सकती है।

4. सादा कारावास की सजा को जुर्माने के रूप में कम कर सकती है।

रेप, नरसंहार, राष्ट्रदोह के बंदियों को नहीं मिलेगी रिहाई

कई बार राज्य सरकारें जघन्य अपराध के दोषी ऐसे बंदी, जिन पर नाबालिग से रेप, नरसंहार, राष्ट्रद्रोह जैसे मुकदमे हैं उन्हें रिहा नहीं करती है। CBI, NIA जैसी केंद्रीय एजेंसियों की विशेष कोर्ट से सजा पाए बंदियों को भी रिहाई नहीं मिलती है। ऐसे बंदी, जिनसे लोक शांति और कानून-व्यवस्था को खतरा हो सकता है, राज्य सरकार उनकी रिहाई रोक सकती है। इसके लिए बंदियों की पात्रता तय करते समय सरकार से रिपोर्ट मांगी जाती है।

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