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What is Excise Policy ? एक्साइज नीति क्या होती है ? कैसे सिसोदिया आए रडार पर ?

DELHI EXCISE POLICY : शराब से सेहत को नुकसान होता है, फिर भी सरकार MANISH SISODIA क्यों बेचती है शराब ? ये सवाल आना लाजिमी है। हर राज्य या कहें कि केंद्र शासित प्रदेशों की अपनी अपनी शराब नीति होती है।

What is Excise Policy ?

एक्साइज नीति क्या होती है ?

जब शराब चीज ही खराब है तो फिर क्यों सरकार इसे बेचती है ? क्या राजस्व के लिए ऐसा किया जाता है ? आखिर क्या होती है शराब नीति ? और क्यों जरूरी है शराब नीति एक राज्य के लिए ? दरअसल शराब को बेचना, बनाना, स्टोर करने के नियम निर्धारित है। यहां तक कि कितनी पीनी है, फिर चाहे सोशल प्लेस पर पीने की बात हो, रेस्टोरेंट में पीने की बात हो या फिर गाड़ी चलाते वक्त पीने की बात हो ? या कितनी उम्र में पीना लीग है, ये सब कुछ नियमों से बंधा हुआ है।

हर राज्य या कहें कि केंद्र शासित प्रदेशों की अपनी अपनी शराब नीति होती है। दुकाने सरकारी हो या प्राइवेट दोनों ही तरह के ठेकों से सरकार पैसा कमाती है। दिल्ली की बात करें कि दिल्ली में पिछले साल नवंबर में नई शराब नीति अस्तित्व में आई थी। इसी साल इस नई शराब नीति को रद्द कर दिया गया है। अब 2021 से पहले वाली शराब नीति लागू की गई है। पुरानी शराब नीति में सरकारी और प्राइवेट दोनों तरह के ठेके होंगे। सरकार का कहना था कि पुरानी नीति को इसलिए खत्म करना पड़ा था, क्योंकि इससे राजस्व का नुकसान हो रहा था।

दिल्ली में एक्साइज नीति को लेकर बवाल क्यों है ?

17 नवंबर 2021 को दिल्ली में नई एक्साइज पॉलिसी लागू हुई थी। इसके तहत राजधानी में 32 जोन बनाए गए थे। हर जोन में ज्यादा से ज्यादा 27 दुकानें खुलनी थीं। कुल मिलाकर 849 दुकानें खुलनी थीं, लेकिन असलियत ये है कि इससे काफी कम शराब की दुकानें खुली। इस वजह से जितनी उम्मीद की जा रही थी, उतने राजस्व की प्राप्ति नहीं हुई। नई नीति लागू होने से पहले तक दिल्ली में शराब की 60% दुकानें सरकारी और 40% प्राइवेट थीं, लेकिन नई नीति लागू होने के बाद 100% दुकानें निजी हाथों को सौंप दी गई। सरकार का तर्क था कि इससे रेवेन्यू में 3,500 करोड़ रुपये बढ़ने की उम्मीद है। लेकिन जब कम कमाई हुई तो फिर सवाल खड़ा होने लगा कि आखिर ऐसी नीति का क्या फायदा ?

दिल्ली में 849 ठेके स्वीकृत थे। 16 नवंबर 2021 को जब दिल्ली में नई आबकारी नीति लागू हुई, उससे पहले भी दिल्ली में 550 ठेके ही थे जिनमें से करीब 250 ठेके सरकारी थे और बाकी प्राइवेट। यानी स्वीकृति ज्यादा थी, लेकिन ठेके खुले कम।

नई आबकारी नीति के तहत दिल्ली में 639 प्राइवेट दुकानें खुल भी गई लेकिन पहली अगस्त 2022 तक आते-आते इन ठेकों की संख्या सिर्फ 339 रह गई है।

केजरीवाल सरकार ने बजट में अनुमान लगाया था कि वर्ष 22-23 की पहली तिमाही में नई आबकारी नीति से सरकार को 2375 करोड़ रुपए का रेवेन्यू आएगा लेकिन इस दौरान सिर्फ 1485 करोड़ रुपए ही रेवेन्यू के रूप में प्राप्त हुए।

इसमें से भी शराब ठेकेदारों ने सिक्योरिटी के रूप में 980 करोड़ रुपए जमा कराए थे जोकि रिफंडेबल हैं यानी वापस किए जाने हैं। इस तरह सरकार को सिर्फ 505 करोड़ का रेवेन्यू ही प्राप्त हुआ है। इस तरह सरकार को 1870 करोड़ रुपए का रेवेन्यू कम हासिल हुआ।

सिसोदिया पर कौन-कौन से आरोप है ?

आरोप है कि टेंडर के लिए अप्लाई करने वाले शराब कारोबारियों को एकमुश्त 144.36 करोड़ रुपये की छूट दी गई। इसके अलावा एयरपोर्ट पर शराब ठेकेदारों के लाइसेंस जब्त करने की बजाय उन्हें 30 करोड़ रुपये की छूट दी। वहीं विदेश से आने वाली बीयर की कीमत भी कम की गई। उस दौरान कैबिनेट को लूप में नहीं रखा गया।

कई फैसले बिना LG की मंजूरी के लिए गए

ऐसा भी आरोप लगा है कि 14 जुलाई को दोपहर 2 बजे कैबिनेट मीटिंग के लिए मुख्य सचिव को सुबह 9:30 बजे कैबिनेट नोट भेजा गया था, जबकि ये नोट 48 घंटे पहले एलजी को भेजा जाना चाहिए था, लेकिन ये एलजी ऑफिस में शाम 5 बजे पहुंचा। आरोप है कि ये सब अवैध फैसलों को वैध बनाने की कोशिश थी।

आरोप ये भी हैं कि L7Z और L1 लाइसेंसधारियों का लाइसेंस पहले 1 अप्रैस से 31 मई और फिर 1 जून से 31 जुलाई तक बढ़ा दिया गया और इसके लिए एलजी की मंजूरी भी नहीं ली गई।

मुख्य सचिव की रिपोर्ट से कटघरे में आए थे सिसोदिया!

ये सब खुलासा उस रिपोर्ट से हुआ है, जो मुख्य सचिव ने एलजी को सौंपी थी। मुख्य सचिव ने दो महीने पहले अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। इस रिपोर्ट में कहा गया कि सरकार ने GNCTD एक्ट 1991, ट्रांजेक्शन ऑफ बिजनेस रूल्स 1993, दिल्ली एक्साइज एक्ट 2009 और दिल्ली एक्साइज रूल्स 2010 के नियमों का उल्लंघन किया।

फिर एलजी ने की थी सिफारिश

इसके बाद एलजी ने सीबीआई जांच की सिफारिश की और फिर सीबीआई ने मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू की। शुक्रवार को 20 से ज्यादा ठिकानों पर सीबीआई ने रेड की।

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