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ईरान को छोटा नाग और अमेरिका को ज़हरीला नाग बताने वाले मुक़्तदा अल सदर की ये है हैसियत

Iraq Ulema Knowledge : यूं तो सियासी तौर पर इराक़ में उठा पटक के दौर का एक अतीत है। लेकिन ताजा घटनाक्रम इस लिहाज से पुरानी तमाम उठापटक के मुकाबले एकदम जुदा है। दरअसल इराक़ में सोमवार को शिया समुदाय के उलेमा मुक्तदा अल सदर ने सियासत से अपना दामन खींच लिया और हमेशा हमेशा के लिए सत्ता की सियासत से दूर रहने का ऐलान कर दिया। नतीजा ये हुआ कि उलेमा के समर्थन में लोग सड़कों पर उतर आए।

इस मामले में सबसे ख़ास बात तो ये है कि उलेमा के समर्थकों ने सड़कों पर उतरकर इराक़ की राजधानी बग़दाद के ग्रीन ज़ोन को अपने गुस्से का शिकार बनाया। और ग्रीन ज़ोन में गोलाबारी की जिससे अल सदर के 15 समर्थकों की मौत हो गई।

उलेमा समर्थक इस कदर बेक़ाबू हो गए थे कि वो सारी हदों को तोड़ते हुए सीधे संसद भवन के भीतर जा घुसे। ये दूसरा मौका था जब इराक़ की संसद पर भीड़ ने कब्ज़ा जमाया था। बीती जुलाई के महीने में ही उलेमा मुक्तदा अल सदर के समर्थकों ने संसद भवन पर धावा बोला था और संसद पर कब्जा कर लिया था।

अब सवाल ये है कि ये मुक्तदा अल सदर हैं कौन और क्यों इराक़ की सत्ता पर इनकी इतनी पकड़ कैसे है?

इराक़ की सियासत का बड़ा नाम हैं मुक़्तदा अल सदर

Iraq Ulema Knowledge: असल में मुक्तदा अल सदर शिया समुदाय के उलेमा हैं। और मौजूदा वक़्त में वो इराक़ के सियासत में सबसे बड़ा चेहरा भी माने जाते हैं। क्योंकि उनकी बात इराक़ में तमाम शिया समुदाय मानता है। पिछले साल अक्टूबर 2021 में इराक़ में हुए चुनाव में मुक्तदा अल सदर की पार्टी ही सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी।

हालांकि इराक़ में सरकार बनाने के लिए ज़रूरी गणित उनके हक़ में फिर भी नहीं आया था। बताया जाता है कि मुक्तदा अल सदर के पिता मोहम्मद सादिक और उनके ससुर मोहम्मद बाकिर भी इराक़ में बड़े उलेमा रह चुके हैं और उनकी लोगों के बीच अच्छी पैठ थी। उन दोनों उलेमाओं के रुतबे की वजह से ही इराक़ के तानाशाह सद्दाम हुसैन ने दोनों को मरवा दिया था।

मुक्तदा अल सदर यूं तो शिया समुदाय से आते हैं। और इराक़ का पड़ोसी मुल्क ईरान भी शिया बाहुल देश है। बावजूद इसके मुक्तदा अल सदर इराक़ में ईरान की दखलंदाज़ी का विरोध करते हैं। इसी वजह से इराक़ के लोग अल सदर को बहुत मानते भी हैं।

अपने ही पिता की विचारधारा से प्रभावित अल सदर इराक़ में उस वक़्त सुर्खियों में आए जब 2005 में सद्दाम हुसैन की मौत हुई थी। अल सदर ने ही इराक़ में सदरिस्ट मुहिम का नेतृत्व किया था। और सबसे बड़ी बात इस मिशन में एक मिलिट्री विंग भी है जिसका नाम जैश अल मेहदी रखा गया है। जिसका मतलब है मेहदी की सेना। लेकिन बाद में जब मुहिम आगे बढ़ी तो जैश अल मेहदी का नाम बदलकर सरया अल सलाम रख दिया गया था मतलब शांति ब्रिगेड।

अमेरिका नापसंद और ईरान का भी है विरोध

Iraq Ulema Knowledge: इराक़ में अल सदर को चाहने वाले इसलिए भी बहुत हैं क्योंकि वो जितना ईरान को नापसंद करते हैं उससे कहीं ज्यादा वो अमेरिका को अपने देश का दुश्मन मानते हैं। अपनी तकरीरों में उन्होंने कई बार कहा है कि अगर ईरान छोटा सांप हैं तो अमेरिका बड़ा और जहरीला नाग है।

मुक्तदा अल सदर इराक़ में लिबरल विचारधारा की मुखालिफत करते हैं। 2018 में अल सदर ने एक नया गठबंधन बनाया था और पहले चुनाव में 54 सीटों पर जीत हासिल की थी। असल में ये चुनाव इस्लामिक स्टेट की हार के बाद इराक़ में पहली बार करवाए गए थे। इसके बाद जब इराक़ में नई सरकार के गठन में अमेरिका ने दखलंदाजी की थी तो अल सदर ने उसका विरोध किया था।

2019 दिसंबर में उन पर जानलेवा हमला हुआ जब राजधानी बगदाद में उनके घर पर ड्रोन से बम बरसाए गए थे। इत्तेफाक से अल सदर उस वक्त अपने घर पर नहीं थे। हालांकि इस हमले में उनका घर पूरी तरह से बर्बाद हो गया था।

2020 में इराक़ के जनरल क़ासिम सुलेमानी पर हुए ड्रोन हमले के बाद अल सदर ने अमेरिका के साथ इराक़ के सुरक्षा समझौते को फौरन रद्द करवा दिया था और अमेरिका दूतावास को खाली करके अमेरिका सैनिकों से फौरन बगदाद से बाहर जाने की मुहिम छेड़ दी थी।

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