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What is Sedition: राजद्रोह और देशद्रोह क़ानून में होता है ये बड़ा अंतर, जानना बेहद ज़रूरी

Sedition Law: सवाल यही उठता है कि आखिर राजद्रोह या देशद्रोह दोनों एक ही चीज़ हैं, क्या एक ही सिक्के के दो पहलू हैं...या इन दोनों ही क़ानून का वजूद और दोनों की हैसियत एक दूसरे से अलग है? इन दोनों क़ानून को लेकर बहस करने वालों में से भी ज़्यादातर को इन दोनों क़ानून का फ़र्क़ ही नहीं मालूम। और इसी बात को लेकर बहस और राजनीति दोनों गर्माई हुई रहती है।

एक जैसे लगने वाले दो अलग अलग शब्दों के अलग अलग अर्थ

Sedition Law: देशद्रोह और राजद्रोह एक जैसे लगने वाले दो अलग अलग शब्द हैं और दोनों के अलग अलग मायने हैं। देश स्थायी है जबकि राज बदलता रहता है। लिहाजा राज के ख़िलाफ़ विरोध हो सकता है लेकिन देश के ख़िलाफ़ विरोध किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं हो सकता है।

राजद्रोह में विधि की छाया में बनाई गई सरकार, नीति और प्रशासनिक अधिकारियों के ख़िलाफ़ असंतोष की भावना फैलाने को राजद्रोह का केस दर्ज हो सकता है।

देश द्रोह में राष्ट्र के प्रति असम्मान, राष्ट्र की एकता और अखंडता को चुनौती देना, या अलगाववाद फैलाना, देश द्रोह का मुकदमा लगाने के लिए उपयुक्त होता है।

क्या है राजद्रोह क़ानून? (what is Sedition?)

Legal News : भारतीय दण्ड संहिता यानी इंडियन पीनल कोड यानी IPC की धारा 124 ए के तहत Sedition मतलब राजद्रोह का केस दर्ज होता है। केस किस पर दर्ज होता है? जो नागरिक या संस्था सरकार विरोधी बातों को बोलता बताता है या उसका समर्थन करता है, राष्ट्रीय संस्थाओं या राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान करता है या फिर संविधान की लिखी मान्यताओं को नकारता है।

संविधान का अपमान करता है। ऐसे में उस व्यक्ति और संस्था के ख़िलाफ़ राजद्रोह का मुकदमा दर्ज होता है। इसके अलावा अगर कोई नागरिक किसी देश विरोधी संगठन के साथ किसी भी तरह का संबंध या लेन देन करता है या वो किसी ऐसे संगठन का किसी भी तरह से सहयोग करता है तो उसके ख़िलाफ़ राजद्रोह का केस चलाया जाता है।

राजद्रोह में कितनी सज़ा होती है?

Law Court Report: राजद्रोह एक ग़ैरज़मानती अपराध है। अगर कोई इस मामले में दोषी पाया जाता है तो वो किसी भी तरह से सरकारी पदों पर आवेदन करने की पात्रता खो देता है। उसका पासपोर्ट रद्द कर दिया जाता है। जब कोर्ट चाहे तब आरोपी को अदालत में हाज़िर होना पड़ता है। अगर किसी व्यक्ति को राजद्रोह क़ानून के अंतर्गत दोषी पाया जाता है तो उसे तीन साल से लेकर उम्रक़ैद तक की सज़ा हो सकती है। इसके अलावा उसे जुर्माना भी देना पड़ सकता है।

एक सवाल अक्सर उठता है कि क्या राजद्रोह क़ानून यानी IPC की धारा 124 ए को ख़त्म भी किया जा सकता है। हालांकि जुलाई 2019 में केंद्र सरकार ने कहा था कि देश विरोधी लोगों, आतंकी तत्वों और अलगाववादी ताक़तों से निपटने के लिए इस राजद्रोह क़ानून को ख़त्म नहीं किया जा सकता है। इस क़ानून की ज़रूरत पड़ती है।

आखिर ये देशद्रोह क़ानून क्या है?

Court Update: अब बात करते हैं देशद्रोह क़ानून की। आखिर ये देशद्रोह क़ानून क्या है? देश में सरकार को क़ानून रूप से चुनौती देना देशद्रोह की श्रेणी में आता है। हालांकि सरकार का लोकतांत्रिक तरीक़े से विरोध किया जाना या उसमें बदलाव के लिए मांग करना देश के हर नागरिक का अधिकार होता है, लेकिन ग़ैरक़ानूनी तरीके से सरकार का विरोध देशद्रोह कहा जाता है।

देशद्रोह के लिए किसी भी ऐसे नागरिक को जिम्मेदार माना जाता है जो देश के ख़िलाफ़ किसी भी गतिविधि में शामिल होकर ऐसे किसी संगठन से संपर्क रखता है। साथ ही आतंकी विचारधारा के साथ व्यक्ति या संस्था का साथ देना भी देशद्रोह की श्रेणी में ही माना जाता है।

देश के ख़िलाफ़ युद्ध की नीयत रखना, युद्ध के नीयति से हथियारों को जमा करना या हथियारों का निर्माण करना, या फिर देश के दुश्मनों से हाथ मिलाकर उनसे हथियारों को लेकर उन्हें छुपाकर रखा देशद्रोह की श्रेणी में आता है। इसके अलावा आतंकवादी वारदात या अलगाववादी हरकतों को बढ़ावा देना भी देशद्रोह का सबसे उपयुक्त उदाहरण है।

देशद्रोह में कितनी होती है सज़ा?

Court Update: देशद्रोह में कितनी सज़ा? IPC की धारा 122 और 123 के तहत दर्ज होने वाले मुकदमों में दस साल से लेकर उम्र क़ैद तक की सज़ा सुनाई जा सकती है।

सीधी बात है जो व्यक्ति सरकार को असंवैधानिक तरीक़े से बदलने और उसके ख़िलाफ़ गतिविधि में हिस्सा लेता है तो उस पर राजद्रोह का मुक़दमा लगाया जाता है जबकि कोई व्यक्ति देश के नुकसान के काम को अंजाम देता है या उसे करता हुआ पाया जाता है तो उसे देशद्रोह की श्रेणी में रखा जाता है।

1870 में लिखा गया था राजद्रोह क़ानून

Court Update: अब सवाल उठता है कि ये क़ानून किसने और क्यों बनाया? असल में राजद्रोह का क़ानून 1870 को बनाकर लागू किया गया था। इस क़ानून को अंग्रेजी हुकूमत के एक एडवोकेट जेम्स स्टीफ़न ने लिखा था। जेम्स स्टीफन का मानना था कि किसी भी सूरत में सरकार की आलोचना को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।

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