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आसान भाषा में : परोल और फरलो में क्या अंतर है, किस राज्य में नहीं मिलता है फरलो? जानें

Explained: The difference between parole and furlough : अभी हाल में ही डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम (Ram Rahim) को 21 दिन की फरलो मिलने की बात सामने आई है. इस तरह राम रहीम जेल से 21 दिन के लिए जेल से बाहर आएंगे.

हालांकि, बिना किसी खास वजह के ही वो जेल से बाहर आ रहे हैं. ऐसे में ये जानना जरूरी होता है कि आखिर फरलो (What is furlough) है क्या चीज. क्या जेल में बंद किसी भी शख्स को फरलो मिल सकती है. ये फरलो और परोल में अंतर क्या है. ये सबकुछ जानेंगे.

सांकेतिक तस्वीर

परोल और फरलो की ये ख़ासियत जानिए

सबसे पहले ये जान लिए कि फरलो सिर्फ सजा पा चुके यानी सजायाफ्ता कैदी को मिल सकता है. लेकिन परोल किसी भी कैदी को मिल सकती है. अब चाहे वो विचाराधीन हो या फिर सजायाफ्ता.

लेकिन परोल के लिए कई शर्तें होती हैं. जैसे वो किसी खास वजह से ही परोल पा सकता है. इसके लिए भी जरूरी है कि जेल में उसका आचरण ठीक हो. लेकिन फरलो के लिए कोई शर्त नहीं होती है.

दरअसल, फरलो इसलिए किसी सजा पा चुके कैदी को मिलता है क्योंकि जेल में उसका जीवन काफी नीरस हो जाता है. ऐसे में कुछ समय के लिए वो जेल से बाहर आकर सामाजिक लोगों से मिलजुल लेता है. फरलो का मकसद ये होता है कि कैदी अपने परिवार और समाज के लोगों से घुलमिल सके.

फरलो को ऐसे समझिए, UP में नहीं मिलता फरलो

Kya hai furlough : फरलो उसे ही मिलता है जिसे लंबे समय के लिए सजा मिल चुकी हो. जैसे आजीवन कारावास की सजा. ऐसे में फरलो को एक कैदी के अधिकार के तौर पर देखा जाता है. इसे बिना किसी कारण के समय-समय पर दिया जा सकता है.

चूंकि, जेल अपने देश के संविधान में राज्य यानी स्टेट का विषय है. इसलिए फरलो को लेकर हर राज्य में अलग-अलग कानून है. जैसे उत्तर प्रदेश में फरलो का प्रावधान नहीं है. यानी यूपी में किसी भी जेल में सजा पा चुके व्यक्ति को फरलो नहीं मिल सकता है. वहीं, कई राज्यों में फरलो साल भर में 3 बार भी मिल सकता है.

क्या होता है परोल

kya hai parole : परोल किसी भी कैदी, सजा पा चुके या फिर विचाराधीन को भी मिल सकता है. लेकिन इसके कई जरूरी शर्तें होतीं हैं. ये किसी कैदी को किसी खास कारण की वजह से ही दिया जा सकता है.

जैसे उसके परिवार में अचानक किसी की मृत्यु हो जाए किसी ब्लड रिलेशन में किसी शादी हो या फिर अन्य कोई खास अवसर. किसी कैदी को परोल से इनकार भी किया जा सकता है. परोल को मंजूरी देने वाला अधिकारी ये कहकर मना कर सकता है कि कैदी को रिहा करना समाज के हित में नहीं होगा.

परोल अक्सर मौत की सजा पाए दोषियों, आतंकवादी के दोषी या फिर जेल से रिहा होने पर भागने की संभावना वाले कैदियों को नहीं दी जाती है. भारत में परोल और फरलो 1894 के कारागार अधिनियम के तहत आता है. कई हत्याओं या आतंकवाद विरोधी गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (UAPA) के तहत दोषी कैदी परोल नहीं मिलती है.

परोल के लिए भी अलग-अलग राज्यों में अलग नियम हैं. उदाहरण के लिए, राजस्थान में, प्रारंभिक परोल 20 दिनों के लिए दी जाती है. वहीं, दूसरी परोल 30 दिनों के लिए और तीसरी परोल 40 दिनों के लिए है. इसके बाद कैदी स्थायी पैरोल के लिए आवेदन कर सकता है.

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