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क्या है पंजशीर का इतिहास, जिससे घबरा रहा है तालिबान?

पंजशीर घाटी, जो दोनों ओर खड़ी पहाड़ों से घिरी हुई है, प्रतिरोध के केंद्र के रूप में जानी जाती है।

कौन है पंजशीर के लोग जो तालिबान से नहीं डरते?

पंजशीर (Panjshir) अफगानिस्तान (Afghanistan)का वो सूबा जो पूरी दुनिया की सुर्खियां बंटोरे हुए है। मगर ये पंजशीर है क्या? अफगानिस्तान का 34वां और वो इकलौता सूबा जो तालिबान (Taliban) के कब्ज़े से अभी भी बाहर है। पंजशीर के ताज़ा हालात क्या हैं ये जानने से पहले ये जानना ज़रूरी है कि आखिर पंजशीर में ऐसा क्या है जिसने तालिबान को नाकों चने चबवा दिए हैं। पंजशीर, पंज यानी पांच और शीर यानी शेर।

दुश्मनों के सामने घुटने नहीं टेकता है पंजशीर

7 ज़िले और 512 गांवों वाला ये पहाड़ी इलाका अफगानिस्तान के उत्तर-पूर्वी इलाके में बसा हुआ, आबादी महज़ 1 लाख 73 हज़ार है। बज़ारक (bazarak) इसकी राजधानी है। खुद को राष्ट्रपति घोषित कर चुके अमरुल्ला सालेह भी यहीं से आते हैं। कहा जा रहा है कि तालिबान के खिलाफ मुकाबले के लिए ये सूबा एक गढ़ के रूप में काम कर रहा है। तालिबान का सामने करने के लिए एक बार फिर याद आने लगी उसी समूह यानी पंजशीर के नॉर्दन एलायंस की जिसने 1970 और 80 के दशक में देश की ढाल का काम किया था। यही नॉर्दन एलायंस एक बार फिर सामने आता दिख रहा है। पहले उपराष्ट्रपति अमरुल्लाह सालेह ने जंग जारी रहने का ऐलान किया। इसके बाद पंजशीर घाटी से अहमद मसूद ने भी ललकार लगाई है।

क्या है पंजशीर का इतिहास?

पंजशीर का नाम यहां की एक कहावत से जुड़ा हुआ है। माना जाता है कि 10वीं शताब्दी में, पांच भाई बाढ़ के पानी को काबू करने में कामयाब रहे थे। उन्होंने गजनी के सुल्तान महमूद के लिए एक बांध बनाया, ऐसा कहा जाता है। इसी के बाद से इसे पंजशीर घाटी कहा जाता है। यानी पांच शेरों की घाटी।

पंजशीर घाटी काबुल के उत्तर-पूर्व में हिंदू कुश में है। ये इलाका 1980 के दशक में सोवियत संघ और फिर 1990 के दशक में तालिबान के खिलाफ प्रतिरोध का गढ़ था। अभी तक की तारीख ये कहती है कि इस इलाके को कभी जीता नहीं जा सका है। न सोवियत संघ, न अमेरिका और न तालिबान इस इलाके पर कभी काबू कर सका।

अब सवाल ये है कि तालिबान ने अब तक पंजशीर पर हमला क्यों नहीं किया है। एक्सपर्ट्स मानते हैं कि पंजशीर घाटी ऐसी जगह पर है जो इसे प्राकृतिक किला बनाता है और इसपर आसानी से हमला ना किए जा पाने की यही सबसे अहम वजह है। और इसका इतिहास भी बताता है कि यहां के लोग दुश्मन के सामने घुटने नहीं टेकते हैं।

इस घाटी को नॉर्दर्न अलायंस भी कहा जाता है। ये अलायंस 1996 से लेकर 2001 तक काबुल पर तालिबान शासन का विरोध करने वाले विद्रोही समूहों का गठबंधन था। अब एक बार फिर ये अलायंस तालिबान के खिलाफ विद्रोह करने के लिए सक्रिय हो चुका है।

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