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एक चोर जिसने जज बनकर दे दी ढाई हज़ार लोगों को जमानत

वो इतनी बार पकड़ा और छोड़ा जा चुका है कि अब तो अदालत जाने पर ज्यादातर जज साहब बस उसकी शक्ल देखते ही बोल उठते हैं... अरे तुम फिर आ गए? पुलिस और अदालत का मुंह देख कर एक बार तो भाई ने खुद ही जज बन कर दो हज़ार मुल्ज़िमों को जमानत भी दे दी। 82 साल की उम्र में सबसे ज़्यादा चोरियों का रिकॉर्ड उसके नाम है।

कुछ लोग जीते जी किंवदंती बन जाते हैं... किंवदंती यानी ऐसी शोहरत, जिसे लेकर क़िस्से कहानियों की शुरुआत हो जाए... वैसे तो अपने-अपने फ़न में माहिर ऐसे लोगों की इस दुनिया में कोई कमी नहीं... लेकिन कोई जरायम की दुनिया में ऐसा नाम पैदा करे जिसे पुलिस से लेकर जज तक बस उसके नाम से पहचानने लगें, तो हैरानी होती है।

दिल्ली का धनीराम मित्तल ऐसा ही है। इससे पहले कि हम धनीराम मित्तल की इस करिश्माई ज़िंदगी के तमाम पहलुओं से आपको वाकिफ़ कराएं। आइए, उसकी ज़िंदगी का एक पुराना किस्सा आपको सुनाते चलें।

आज से कोई 20 साल पहले एक बार गिरफ्तार होने के बाद धनीराम मित्तल को अदालत में पेश किया। चूंकि तब तक अदालतों के चक्कर धनीराम के लिए रोज़ की बात बन चुकी थी, उस रोज़ जज साहब ने खीझ कर उसे अपनी अदालत से बाहर जाने को कहा।

वो बाहर गया और फिर चुपचाप निकल गया। बाद में जब उसकी पेशी की बारी आई, तो पुलिस के हाथ पांव फूल गए क्योंकि तब तक धनीराम पुलिसवालों को जज साहब का हवाला देकर क़ानून के शिकंजे से बाहर निकल चुका था।

दुनिया में चोर तो बहुत हुए और आगे भी होंगे लेकिन धनीराम के धनीराम बनने की कहानी दूसरी सुनने को नहीं मिलेगी। पुलिस के पुराने और धाकड़ अफ़सरों की मानें तो धनीराम के पास जैसा दिमाग़ है वैसा किसी और के पास नहीं। वो अक्सर आंखों के सामने खुलेआम और दिन के वक्त चोरी करता है और देखने वाला खुद भी अपना माल चोरी होता हुआ देखने के बावजूद उसे रोक नहीं पाता।

असल में यही धनीराम मित्तल की ख़ासियत है... वो अपने काम यानी जरायम में इतना माहिर है कि उसका दूर-दूर तक कोई तोड़ नहीं । ये तो धनीराम के ज़िंदगी की बस एक झलक भर है पचास सालों के चोरी के करियर में उसने ऐसी-ऐसी वारदातें की हैं कि सुनते-सुनते इंसान थक सकता है, लेकिन क़िस्से ख़त्म नहीं हो सकते।

पुलिस की दो-तीन पीढ़ियां उसके देखते देखते बदल गईं। चोर पुलिस का खेल तक बदल गया। पर वो नहीं बदला। पचास साल पहले पहली चोरी की और अब पचाल साल बाद गिनती हजारों में है। उसने चोरी पर रिसर्च करने के लिए बाकायदा पढ़ाई तक की।

वकीलों से छुटकारा पाने और अपने ही केस की खुद पैरवी करने के लिए एलएलबी की पढ़ाई कर वकील बन गया। फिर हैंडराइटिंग एक्सपर्ट ( handwriting expert) की पढ़ाई की। इतना ही नहीं बाद में ग्राफोलॉजी (graphology) की डिग्री भी हासिल कर ली। मगर चोरी नहीं छोड़ी।

जुर्म की दुनिया में चार्ल्स शोभराज का अपना अलग ही मुकाम है । हिंदुस्तान में अगर किसी की तुलना चार्ल्स शोभराज से होती है, तो वो यही शख्स है... धनीराम मित्तल...

चोरी की ट्रेनिंग भी देता है धनीराम!

दुनिया जानती है कि धनीराम मित्तल ने अपने बाल धूप में सफ़ेद नहीं किए, बल्कि चोरी और जालसाज़ी को उसने अपनी पूरी ज़िंदगी दी है । अपनी इन्हीं करतूतों की बदौलत आज धनीराम बदनाम तो बहुत है, लेकिन यही वजह भी है कि नए दौर के गुनहगार जुर्म की बारीकियां सीखने दूर-दूर से धनीराम के पास पहुंचते हैं और उसकी जी-हुजूरी करते हैं।

धनीराम ने जुर्म के इस दाग़दार करियर की शुरुआत आज से कोई 50 साल पहले तब की थी, जबकि उसकी उम्र कोई 25 साल के आस-पास थी । इतने ही साल पहले 1964 में वो पहली बार पुलिस के हत्थे चढ़ा था तब हम से बहुत से लोग तो इस दुनिया में ही नहीं आए थे लेकिन तब से लेकर अब तक धनीराम ने जुर्म का जाल-बट्टा कुछ ऐसा फैलाया कि अब उसके आस-पास भी कोई और नहीं टिकता।

उसने चोरी के लिए भी की पढ़ाई-लिखाई!

कहते हैं पढ़ा लिखा गुनहगार ज़्यादा खतरनाक होता है धनीराम पर ये बात बिल्कुल सोलह आने सही बैठती है । उसने चोरी करते-करते ही ना सिर्फ़ एलएलबी की पढ़ाई की और वकील बन गया, बल्कि हैंडराइटिंग एक्सपर्ट और ग्राफोलॉजी की डिग्री भी हासिल की। कहनेवाले कह सकते हैं कि धनीराम को पढ़ने-लिखने का शौक है लेकिन हक़ीक़त ये है कि उसने जुर्म की दुनिया में खुद को और भी ज़्यादा मज़बूत करने के इरादे से ही ये डिग्रियां हासिल कीं।

एलएलबी कर वो क़ानून का जानकार बन गया और क़ानून की आंखों में और ज़्यादा महारत से धूल झोंकने लगा । जबकि हैंडराइटिंग एक्सपर्ट और ग्राफोलॉजी की पढ़ाई कर उसे जालसाज़ी करने में महारत मिली । मसलन, अब वो खुद ही गाड़ियां चुराता, उसके फर्जी कागज़ तैयार करता और उसे आगे बेच देता।

जब चोरी करते-करते जज बन बैठा वो!

ऐसा अजीब कारनामा सिर्फ़ धनीराम ही कर सकता था। आज से कुछ साल पहले जब चोरी करते-करते उसे बोरियत होने लगी, तो उसने कुछ नया करने की सोचा । एक रोज़ फ़र्ज़ी कागज़ातों की बिनाह पर उसने झज्जर कोर्ट के एडिशनल सेशल जज को तकरीबन दो महीने की छुट्टी पर भेज दिया और फिर उनके पीछे मुड़ते ही खुद जज की कुर्सी पर विराजमान हो गया।

इसके बाद तो उसने कितने को कैसी-कैसी सज़ा दी और कितनों को माफ़ी इसका सही-सही हिसाब किसी के पास नहीं है । हालांकि पुलिस का कहना है कि इन दो महीनों में उसने कुल 2 हज़ार सात सौ चालीस गुनहगारों को तो ज़मानत पर ही रिहा कर दिया था।

एक हज़ार से ज़्यादा गाड़ियां चुरा चुका है वो

धनीराम को कोई गाड़ी जंचती नहीं कि वो फ़ौरन उसे उड़ा लेता है । फिर चाहे उसकी टेक्नोलॉजी कैसी भी हो और वो कहीं भी पार्क की गई हो। यही वजह है कि धनीराम अब तक एक हज़ार से ज्यादा गाड़ियों पर हाथ साफ़ कर चुका है । एक हज़ार का ये आंकड़ा तो पुलिस की रिकॉर्ड के मुताबिक है असल में धनीराम ने कितनों को बे-कार किया है, ये ना तो धनीराम को पता है।

वैसे तमाम चोरों की तरह धनीराम मित्तल का भी एक सिग्नेचर स्टाइल है... ज़्यादातर गाड़ियां चुराने के बाद धनीराम खुद ही फर्जी कागजातों के ज़रिए उन्हें आगे बेच देता है... और इसके लिए वो कोई मोटी रकम भी नहीं लेता, बल्कि औने-पौने क़ीमत पर चोरी की गाड़ियां खपा देता है ।

धनीराम के बारे में कहा जाता है कि वो चोरी की गाड़ियों का कारोबार करने वाले गैंग्स से बाकायदा मेक, कलर और मॉडल के मुताबिक गाड़ियां सप्लाई करने का ऑर्डर लेता है और फिर उसी तरह की गाड़ियां उड़ा कर उसे आगे सप्लाई कर देता।

वो अक्सर गाड़ियां चुराने भी गाड़ी से ही पहुंचता है । मास्टर-की से नई गाड़ी चुराता है और फिर मौका मिलते ही नया-पुराना दोनों ले उड़ता । गलती से पकड़े जाने पर वो खुद को वकील और उम्र दराज़ बता कर ग़लती से दूसरी गाड़ी में चाबी लगा देने की बात कह कर लोगों को धोखा दे देता।

ऐसे हुई जुर्म के करियर की शुरुआत

एक मिडिल क्लास फैमिली से ताल्लुक रखनेवाला धनीराम 1939 में भिवानी में पैदा हुआ था। रोहतक कॉलेज से ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई पूरी की । फ़र्ज़ी दस्तावेज़ बनवा कर रेलवे की नौकरी हासिल कर ली। तब वो स्टेशन मास्टर बना।

पर फिर बाद में उसकी पोल खुल गई। लेकिन जब तक पोल खुली वो कई और खेल कर चुका था। इसके बाद पटरियों पर दौड़ने वाली रेल से तो उसका नाता टूट गया, लेकिन फिर उसने जुर्म की रेल ऐसी दौड़ाई कि ना जाने कितने ही स्टेशन पीछे छूट गए।

उम्र के इस पड़ाव में आकर धनीराम बेशक जुर्म की दुनिया में अलग-थलग पड़ चुका है लेकिन एक दौर था जब उसका भी गैंग हुआ करता था । उसके गैंग में सौ से ज़्यादा गुर्गे थे लेकिन बदलते वक्त के साथ हर गुर्गे ने अपनी-अपनी लूटमार की दुकान अलग कर दी।

वैसे तो हर साल या फिर यूं कहें कि उसकी पूरी ज़िंदगी का ज़्यादातर वक्त बड़े घर यानी जेल की सलाखों के पीछे ही निकल गया लेकिन जब भी वो जेल से बाहर होता है तो दिल्ली के नरेला इलाक़े के टिकरी खुर्द गांव में ही रहता है । ये और बात है कि अपने इस गांव में से निकल उसकी मार अब पूरे उत्तर पूर्वी भारत के कई राज्यों में है।

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